Basukinath Dham

Basukinath Dham

Namaste

Baba Basukinath (History): Thousands of years ago, during Samudra Manthan (the churning of the great seas) by Gods and the Asuras, serpent (Nag) Vasuki was used as a rope for the churn (Mandar hills). Subsequently the badly injured serpent Vasuki took refuge as a lingam in a nearby forest named Daruk Vaan .

Centuries later, during a famine a man named Vasu went out in the Daruk forest in search of tubers (kand) for food. In the process of digging the ground he hit upon Vasuki who was lying there since centuries as a Lingam, and a stream of blood came out of it. Vasu got a scare and ran away. Later that night in his sleep he saw Naag Vasuki telling him not to be afraid and he should instead worship him.

The very next day morning, Vasu got up, took a bath and offered prayers and Pooja at the lIngam. Pleased with this Lord Shiva granted him a boon and said that hence forth this lingam would be named after him and then on the lingam came to be known as Baba Basukinath.

As per tradition Kanwarias (specially in the month of Shrawan) carry two pots of Ganga Jal from Sultanganj, one of which is offered at Baba Baidyanath Jyotirlingam at Babadham (Baidyanath Dham) while the other is offered at Baba Basukinath Dham, then only Kanwar Yatra is said have been completed.

बाबा बसुकीनाथ (इतिहास ) : ज्ञात हो आज से हजारों वर्ष पूर्व समुद्र मंथन मे नाग बासुकी को मथनी के रस्सी के रूप मे हुआ था, जिसका प्रयोग देवताओं और दानवों ने मिलकर किया था । वही नाग वासुकि घायल अवस्था मे दारुक वन (वर्तमान) मे बसुकीनाथ धाम में लिंग रूप मे अवस्थित हो गया ।

कालांतर मे अकाल पड़ने के कारण, कन्द – मूल की खोज में वासु नामक एक व्यक्ति, उसी दारुक वन में खंती से मिट्टी खोदने लगा, खंती के प्रहार से पत्थर रूपी शिवलिङ्ग से रक्त की धार निकलने लगी । वासु घबरा कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ, रात्री में उनके स्वप्न मे नाग वासुकि ने आकर कहा, घबराओ नहीं मैं नाग वासुकी हूँ , तुम मेरी पूजा करो ।

नाग वासुकी के स्वप्न मे दिए निर्देशानुसार वासु प्रातः स्नान कर शिवलिङ्ग की पूजा की, और देवधिदेव महादेव ने प्रसन्न हो उन्हें वरदान दिया की मैं तुम्हारे नाम से जाना जाऊंगा । आज से मेरा नाम वासुकीनाथ होगा । इसके बाद से आज तक यह इसी नाम से विख्यात है ।

बाबा बसुकीनाथ को फौजदारी बाबा भी कहा जाता है, मान्यता है की यहाँ आने से जटिल से जटिल विवाद का भी समाधान हो जाता है ।

ऐसी प्रथा है की काँवर यात्रा मे कांवरिया सुलतानगंज से जल के दो पात्र लाते हैं, एक पात्र के जल से पहले बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक कर दूसरे पात्र का जल बाबा बासुकीनाथ को अर्पित किया जाता है, तभी काँवर यात्रा पूर्ण मानी जाती है ।

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