Baidyanath Dham
बैद्यनाथधाम

देवघर में स्थापित ज्योर्तिलिंग शिव व शक्ति का सम्मिश्रण है। यहां दोनों विराजमान है, जिसका पुराणों में प्रमाण है। शिवरात्रि की रात यहां शिवलिंग पर सिंदूर दान होता है। यह किसी दूसरे ज्योर्तिलिंग में देखने को नहीं मिलता है। बैद्यनाथधाम शक्तिपीठ भी है और यहां सती का हृदय गिरा है। शक्तिपीठ की एकमात्रा में शक्ति अंश शिवांश को समभाव में लेकर संगठित होती है। देवी भागवत एवं तंत्र चूड़ामणि में इस पीठ का नाम बैद्यनाथधाम है। 

About Baidyanath Dham बैद्यनाथधाम एक परिचय

Namaste

Poorvottare Prajwalika Nidhane Sada Vasantam Girija Sametam Surasuraradhita Padyapadmam Sri Baidyanatham Tamaham Namami.

पुर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने, सदावसन्तं गिरिजासमेतं ।
सुरासुराराधित्पाद्य्पद्मं श्री बैद्यानाथं तमहं नमामि ।।

Welcome !! to Baidyanath Jyotirlinga temple, also known as Baba Baidyanath Dham or  Baidyanath Dham. It is one of the twelve Jyotirlinga of Lord Shiva, the most sacred abode of Lord Shiva. It is located here at Deoghar in the state of Jharkhand, India. It is a temple complex consisting of the main temple of Baba Baidyanath, where the Jyotirlinga is installed, Jaya Durga Shaktipeeth (Hridya Peeth) and 20 other temples.

According to beliefs, the Mahapandit demon king Ravana worshipped Shiva to get the boons that he later used to wreak havoc in the world. Mahapandit Ravana offered his ten heads one after another to Shiva as a sacrifice. Pleased with this, Shiva descended to cure Ravana. As he donned the role of a doctor, he is referred to as Baidya (“doctor”). From this aspect of Shiva, the temple derives its name.

As per ancient scriptures, the Jyotirlingam was gifted to Mahapandit Ravana on the condition that he would not put the divya Jyotirlingam on ground, till it is established in Lanka (as desired by Ravana). Since the Divya Lingam would make Mahapandit and demon King Ravan invincible forever, gods plotted and en-route to Lanka, in the urge to answer natures call Ravana was forced to handover the divya lingam to Lord Vishnu disguised as a herder roaming nearby, who ultimately placed the divya lingam on the ground since  the demon King took took long to relieve himself. ‘Harla Jori‘, the place where this story unfolded is around 5 km. North of  the current resting place of Baba  Baidyanath Jyotirlingam. Subsequently the Jyotirlingam on divine intervention was brought to its current place by Baiju Gwala hence Baba Baidyanath is also sometimes called as Baba Baijnath.

It is believed that Mahapandit demon King Ravana established a Yantra with a embedded Mani (Jewel) called ‘CHANDRAKANTA MANI’ over the Jyotirlinga in the Sanctum Sanctorum, a constant stream of water trickles down from the Mani offering a unending Abhishekam of the Jyotirlingam.

Kanwar Yatra is an annual pilgrimage (now this has extended to an all year round event) of devotees of Lord Shiva, known as Kanwaria. Millions of Kanwarias carry sacred water from Ganges at Sultanganj across hundreds of miles to dispense as offerings in Baidyanath Temple in Jharkhand.

Baidyanatham “Chithabhoomau”, Shivmahapuran, Satarudra Samhita, is the ancient verse that identifies location of Baidyanath Jyotirlinga. According to which Baidyanath is in ‘Chitabhoomi’, which is the ancient name of Deoghar.

Baidyanath jyotirlinga is located at ‘Prajwalika Nidhanam’ (meaning funeral place i.e., chithabhoomi) in the North-Eastern part of the country. Also Chitabhoomi indicates that, in olden days, this was a funeral place, where last rites of Mata Parwati were performed. This place has been a center of tantric cults like Kapalika/Bhairava where Lord Shiva is worshiped.

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पूर्वी भारत के, झारखंड राज्य में देवघर का बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) मंदिर भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। बैद्यनाथ धाम का कामना  लिंग द्वादश ज्योतिर्लिगों में सर्वाधिक महिमामंडित कहा जाता है। पूर्वी भारत का एकमात्र ज्योतिर्लिंग धाम होने के साथ ही बैद्यनाथधाम शक्ति पीठ भी है, यहाँ माता सती का हृदय गिरा था इस कारण इसे हृदय पीठ अथवा हार्द पीठ के नाम से भी जाना जाता है । बैद्यनाथ धाम ‘देवघर’ की पुण्य भूमि में ज्योतिर्लिंग रूप मे देवाधिदेव महादेव के साथ माता पार्वती की हृदय प्रदेश का होना बड़े गौरव की बात है, इसे एक दिव्य संगम माना गया है।  

कहते हैं भोलेनाथ यहां आने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. इसलिए इस शिवलिंग को ‘कामना लिंग’ के नाम से भी जाना जाता है, पुराणों के अनुसार माता पार्वती ने शिव को वर रूप में प्राप्त करने के लिए इसी शिवलिङ्ग की पूजा की थी , अतः यह शिवलिङ्ग उन्हे अतिप्रिय है । 

पौराणिक कथाओं मे वर्णित है की, महापंडित लंकापति रावण के तप से प्रसन्न हो महादेव उनके साथ लंका चलने को राजी हो गए, इस हेतु उन्होंने अपने आत्म लिंग रावण को प्रदान कर दिया इस शर्त के साथ की अगर वह इसे धरती पर कहीं रखेगा तो शिवलिङ्ग वहीं स्थापित हो जाएगा, यह बात माँ पार्वती को रास नहीं आई और जब देवताओं ने जाना, तो वे चिंतित हो उठे, क्योंकि इस आत्म लिंग मे स्थित शक्तिओं से रावण अजेय होने के साथ साथ अमरत्व को प्राप्त हो जाता, अतः योजनानुसार माँ गंगा का आवाहन किया गया, और वो रावण के जलपात्र मे प्रवेश कर गयीं,  तदुपरांत इस जल को पीने से रावण को लघुशंका की तीव्र इच्छा हुए और विवश हो उसे लंका जाने के क्रम मे “हरला जोरी” नामक स्थान पर रुकना पड़ा और वहीं पहले से चरवाहे के रूप मे विचर रहे भगवान विष्णु को इस आत्म लिंग को थमा कर निवृत्त होने गया, जब उसके आने मे देर हुए तो चरवाहे ने शिवलिङ्ग को पृथ्वी पर रख दिया और तब से ये वही स्थापित हो गया, षड़यंत्र का आभास होने से लंकापति रावण ने क्रोध मे आकार वह खड़े एक पेड़ को गिर दिया, जिसके जड़ों से एक स्वयंभू लिंग प्रकट हुआ जिसे “हरितकिनाथ ” के नाम से जाना जाता है और आज भी हरला जोरी मे स्थित है, कालांतर मे शिव के आदेश से बैजु नामक ग्वाले ने इसे अभी के बैद्यनाथ धाम मे स्थापित किया ।

बैद्यनाथधाम नाम को लेकर भी कई तथ्य हैं। मंदिर के गर्भगृह में चंद्रकांत मणि है। जिससे सतत जल स्रवित होकर लिंग विग्रह पर गिरता है। बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंगपर गिरनेवाला जल चरणामृत के रूप में जब लोग ग्रहण करते हैं तब वह किसी भी रोग से मुक्ति दिलाता है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, ‘पंचशूल’ है, जिसे सुरक्षा कवच माना गया है। मान्यता है कि पंचशूल के दर्शन मात्र से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं

‘धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान शंकर ने अपने प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचवक्त्रम निर्माण की विधि बताई थी, जिनसे फिर लंकापति रावण ने इस विद्या को सीखा था। पंचशूल अजेय शक्ति प्रदान करता है। रावण ने उसी पंचशूल को इस मंदिर पर लगाया था, जिससे इस मंदिर को कोई क्षति नही पहुंचा सके।

‘त्रिशूल’ को भगवान का हथियार कहा जाता है, परंतु यहां पंचशूल है, जिसकी सुरक्षा कवच के रूप में मान्यता है। भगवान भोलेनाथ को प्रिय मंत्र ‘ओम नम: शिवाय’ पंचाक्षर होता है। भगवान भोलेनाथ को रुद्र रूप पंचमुख है।

सभी ज्योतिर्पीठों के मंदिरों के शीर्ष पर ‘त्रिशूल’ है, परंतु बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में ही पंचशूल स्थापित है। ऐसी मान्यता है की पंचशूल द्वारा प्रदत्त सुरक्षा कवच के कारण ही इस मंदिर पर आज तक किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ है।

बाईस मंदिरों वाले बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर मे ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ मंदिर, शक्ति पीठ माँ पार्वती मंदिर, के अलावे 20 अन्य मंदिर स्थित हैं ।

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