Shakti Peeth - Jay Durga

जय दुर्गा शक्ति पीठ (हृदय पीठ)

Shakti Peeth - शक्ति पीठ 

Namaste

Shakti Peeth Jay Durga Temple at Baidyanath is the place where Sati’s Heart had fallen. Here Sati is worshipped as Jay Durga and Lord Bhairav as Baidyanath. Since the heart of Sati fell here, the place is also called as Hardapeetha or Hridaya Peeth. Lord Bhairav as Baidyanath is worshipped as one of the important twelve Jyotirlingas.

Within the campus, Jay Durga Shakti Peeth is present exactly opposite to the main temple of Baidyanath. Both the temples are connected by red colored silk ribbon in their tops known as Gathbandhan representing the holy knot tied to couples during Saptpadi in marriage. There is a belief that the couple who binds these two tops with the ribbon will have a happy family life by the blessings of Lord Shiva and Parvati.

Within the temple the idols of Durga and Parvati are present on a rock stage. People usually climb it up and offer flowers and milk to the goddesses. Many Tantriks worshiped Jay Durga and got her blessings. Here Jaganmata is worshiped in two forms. The first one being Tripura sundari / Tripura bhairavi and the second one being Chinnamasta. Tripura Sundari is worshiped with Ganesh as Rishi and Chinnamasta is worshiped with Ravanasura as Rishi.

Jay durga Shakti Peeth is located at Chitabhumi, another name of present day Deoghar. It is said that while lord Shiva was wandering in the universe with the body of Sati, heart of Sati had fallen at this place. That time, lord Shiva performed the cremation here. Hence, this place is called Chita Bhumi.

Baidyanath Shakti Peeth is the not just a Shakti Peeth, but also, an auspicious place where a person gets relieved from all diseases. It is believed that the person who visits this place, he gets freedom from all sorts of disease, and all kinds of sins. Bad or negative thoughts are removed from a person’s mind. The individual attains a higher level of Spiritual consciousness. Hence, it is called Baidyanath.

देवघर शक्तिपीठ भी है, यह हृदयपीठ कहलाता है। इसकी ऐतिहासिक धारणा धार्मिक साहित्य के आधार दक्ष यज्ञ से जुड़ी है। जब माता सती वहां गईं और पिता के मुख से पति का अनादर सुना तो यज्ञ कुंड में कूद गईं। उसके बाद तो हाहाकार मच गया। शिव सुनते ही वहां पहुंचे। क्रोधित होकर सती के मृत शरीर को कंधे पर लेकर तांडव करने लगे। तब विष्णु ने अपने चक्र से सती के मृत देह को 52 हिस्सों में काट डाला। वह जिस जिस स्थान पर गिरा वही शक्तिपीठ  कहलाया।

देवघर में माता का हृदय गिरा और जयदुर्गा शक्ति के रूप में है। देवघर की शक्ति साधना में भैरव की प्रधानता है और बैद्यनाथ स्वयं यहां भैरव हैं। इनकी प्रतिष्ठा के मूल में तांत्रिक अभिचारों की ही प्रधानता है। तांत्रिक ग्रंथों में इस स्थल की चर्चा है। देवघर में काली और महाकाल के महत्व की चर्चा तो पद्मपुराण के पातालखंड में भी की गयी है।

ऐसी मान्यता है कि जब शिव को प्रसन्न करने के लिए लंकापति रावण ने शीश चढ़ाना शुरू किया तो वे प्रसन्न हो गए और कैलाश जाने को साथ हो गए। इतना ही नहीं रावण के शीश को जोड़ दिया था, तब से वह बैद्यनाथ कहलाए।

शिव पुराण के अध्याय 38 में भी द्वादश ज्योर्तिलिंग की जो चर्चा की गई है, उसमें बैद्यनाथं चिताभूमौ का उल्लेख है। जो यह स्पष्ट करता है कि यह चिताभूमि तत्कालीन बिहार संप्रति झारखंड में अवस्थित है। इसे कामना लिंग कहा जाता है। सारी मनोरथ विल्वपत्र के साथ जलार्पण से पूरी हो जाती है।

बैद्यनाथ नाम को लेकर भी कई तथ्य हैं। मंदिर के गर्भगृह में चंद्रकांता मणि है। जिससे सतत जल स्रवित होकर लिंग विग्रह पर गिरता है। बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंगपर गिरनेवाला जल चरणामृत के रूप में जब लोग ग्रहण करते हैं तब वह किसी भी रोग से मुक्ति दिलाता है। बारह ज्योर्तिलिंग में यह एकमात्र ज्योर्तिलिंग है जहां शिवरात्रि के अवसर पर रात्रि प्रहर शिवलिंग पर सिंदूर दान होता है, क्योंकि शिव व शक्ति एक साथ विराजते हैं।

शक्तिपीठ की एकमात्रा में शक्ति अंश शिवांश को समभाव में लेकर संगठित होती है। देवी भागवत एवं तंत्र चूड़ामणि में इस पीठ का नाम बैद्यनाथधाम है। देवघर में स्थापित ज्योर्तिलिंग शिव व शक्ति का सम्मिश्रण है। यहां दोनों विराजमान है, जिसका पुराणों में प्रमाण है। शिवरात्रि की रात यहां शिवलिंग पर सिंदूर दान होता है। यह किसी दूसरे ज्योर्तिलिंग में देखने को नहीं मिलता है।

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